श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  3.188.85 
ततस्तं मारुतं घोरं स्वयम्भूर्मनुजाधिप।
आदि: पद्मालयो देव: पीत्वा स्वपिति भारत॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
नरेश्वर! इसके बाद कमल में स्थित ब्रह्माजी स्वयं उस भयंकर वायु को पीकर सो जाते हैं॥85॥
 
Nareshwar! After this, Lord Brahma himself, who resides in the lotus, drinks that terrible air and falls asleep. 85॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)