Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.188.84: तत्पश्चात् वे बादल, जो चारों ओर फैलकर सम्पूर्ण आकाश को घेरे हुए हैं, वायु के प्रचण्ड वेग से तितर-बितर हो जाते हैं और सहसा अदृश्य हो जाते हैं ॥ 84॥ | mahabharat अध्याय 3.188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
सर्वत: सहसा भ्रान्तास्ते पयोदा नभस्तलम्।
संवेष्टयित्वा नश्यन्ति वायुवेगपराहता:॥ ८४॥
अनुवाद
तत्पश्चात् वे बादल, जो चारों ओर फैलकर सम्पूर्ण आकाश को घेरे हुए हैं, वायु के प्रचण्ड वेग से तितर-बितर हो जाते हैं और सहसा अदृश्य हो जाते हैं ॥ 84॥
Thereafter, those clouds, spreading all around and encircling the whole sky, are dispersed by the tremendous force of the wind and suddenly become invisible. ॥ 84॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥