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mahabharat 3.188.83: भारत! तत्पश्चात् समुद्र अपनी सीमा से बाहर चला जाता है, पर्वत फट जाते हैं और पृथ्वी जल में डूब जाती है।   |   mahabharat अध्याय 3.188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  3.188.83 
तत: समुद्र: स्वां वेलामतिक्रामति भारत।
पर्वताश्च विदीर्यन्ते मही चाप्सु निमज्जति॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
भारत! तत्पश्चात् समुद्र अपनी सीमा से बाहर चला जाता है, पर्वत फट जाते हैं और पृथ्वी जल में डूब जाती है।
 
Bharat! Thereafter the ocean exceeds its limits, the mountains burst and the earth submerges in water.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)