श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  3.188.72 
ततो योजनविंशानां सहस्राणि शतानि च।
निर्दहत्यशिवो वायु: स च संवर्तकोऽनल:॥ ७२॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् अशुभ प्रबल वायु और घूमती हुई अग्नि बाईस हजार योजन तक के लोगों को भस्म कर देती है ॥72॥
 
Thereafter the ominous strong wind and the rotating fire consume the people up to a radius of twenty-two thousand yojanas. ॥72॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)