श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  3.188.70 
तत: स पृथिवीं भित्त्वा प्रविश्य च रसातलम्।
देवदानवयक्षाणां भयं जनयते महत्॥ ७०॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् अग्नि पृथ्वी को भेदती हुई रसातल में पहुँच जाती है और देवताओं, दानवों तथा यक्षों को महान भय उत्पन्न करती है। 70.
 
Thereafter the fire pierces the earth and reaches the abyss and causes great fear to the gods, demons and Yakshas. 70.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)