श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  3.188.7-8 
त्वया लोकगुरु: साक्षात् सर्वलोकपितामह:।
आराधितो द्विजश्रेष्ठ तत्परेण समाधिना॥ ७॥
स्वप्रमाणमथो विप्र त्वया कृतमनेकश:।
घोरेणाविश्य तपसा वेधसो निर्जितास्त्वया॥ ८॥
 
 
अनुवाद
द्विजश्रेष्ठ! आपने मन की वासनाओं को यत्नपूर्वक रोककर सम्पूर्ण लोकों के पितामह भगवान ब्रह्माजी की आराधना की है। विप्रवर! आपने अनेक बार इस जगत की आदि सृष्टि प्रकट की है और घोर तपस्या द्वारा मरीचि आदि प्रजापतियों को भी जीत लिया है। 7-8॥
 
Dwijshreshtha! You have diligently restrained the passions of the mind and worshiped Lord Brahmaji, the Grandfather of all the worlds. Vipravara! You have manifested the initial creation of this world many times and have conquered even the Prajapatis (Marichi etc.) through severe penance. 7-8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)