श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  3.188.68 
यच्च काष्ठं तृणं चापि शुष्कं चार्द्रं च भारत।
सर्वं तद् भस्मसाद् भूतं दृश्यते भरतर्षभ॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
हे भरतवंशी भूषण! उस समय घास, लकड़ी और सूखे-गीले सभी पदार्थ भस्म हो जाते हैं॥68॥
 
O Bhushna of the Bharata clan! At that time all the grass, wood, and dry or wet substances appear to be reduced to ashes. ॥ 68॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)