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mahabharat 3.188.59: मनुष्य का मांस खाने वाले हिंसक पशु-पक्षी भी नागरिकों के उद्यानों और मंदिरों में सोएंगे ॥59॥   |   mahabharat अध्याय 3.188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  3.188.59 
पुरुषादानि सत्त्वानि पक्षिणोऽथ मृगास्तथा।
नगराणां विहारेषु चैत्येष्वपि च शेरते॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य का मांस खाने वाले हिंसक पशु-पक्षी भी नागरिकों के उद्यानों और मंदिरों में सोएंगे ॥59॥
 
The ferocious animals and birds that eat human flesh will also sleep in the gardens and temples of citizens. ॥ 59॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)