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mahabharat 3.188.57-58: राजा! थोड़ा-सा धन इकट्ठा होने पर लोग धन के अभिमान से उन्मत्त हो जाएँगे। यदि कोई अपने धन को जमा करके रख ले, तो अधिकांश पापी और निर्लज्ज मनुष्य उस जमा को हड़पने का प्रयत्न करेंगे और उससे स्पष्ट कह देंगे कि तुम्हारा कुछ भी हमारे पास नहीं है॥ 57-58॥   |   mahabharat अध्याय 3.188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 57-58
 
 
श्लोक  3.188.57-58 
संचयेन तथाल्पेन भवन्त्याढॺमदान्विता:।
धनं विश्वासतो न्यस्तं मिथो भूयिष्ठशो नरा:॥ ५७॥
हर्तुं व्यवसिता राजन् पापाचारसमन्विता:।
नैतदस्तीति मनुजा वर्तन्ते निरपत्रपा:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
राजा! थोड़ा-सा धन इकट्ठा होने पर लोग धन के अभिमान से उन्मत्त हो जाएँगे। यदि कोई अपने धन को जमा करके रख ले, तो अधिकांश पापी और निर्लज्ज मनुष्य उस जमा को हड़पने का प्रयत्न करेंगे और उससे स्पष्ट कह देंगे कि तुम्हारा कुछ भी हमारे पास नहीं है॥ 57-58॥
 
King! On accumulating a little wealth, people will become mad with the pride of being rich. If someone trusts and keeps his wealth as a deposit, then most of the sinful and shameless people will try to usurp that deposit and will clearly tell him that we do not have anything of yours.॥ 57-58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)