श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  3.188.56 
नगराणां विहारेषु विधर्माणो युगक्षये।
अधर्मिष्ठैरुपायैश्च प्रजा व्यवहरन्त्युत॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
युग के अन्त के समय पापी मनुष्य नगरों के उद्यानों में डेरा डालेंगे और पापकर्मों द्वारा लोगों पर अत्याचार करेंगे ॥ 56॥
 
At the time of the end of the age, sinful men will camp in the gardens of the cities and will mistreat the people by sinful means. ॥ 56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)