श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  3.188.54 
धर्मिष्ठा: परिहीयन्ते पापीयान् वर्धते जन:।
धर्मस्य बलहानि: स्यादधर्मश्च बली तथा॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
धर्मात्माओं को हानि होती दिखाई देगी, जबकि बड़े-बड़े पापी सांसारिक दृष्टि से समृद्ध होंगे। धर्म की शक्ति क्षीण हो जाएगी और अधर्म प्रबल हो जाएगा ॥ 54॥
 
The righteous will be seen to suffer losses while the biggest sinners will prosper from a worldly point of view. The power of righteousness will diminish and unrighteousness will become stronger. ॥ 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)