श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  3.188.51 
हिंसाभिरामश्च जनस्तथा सम्पद्यतेऽशुचि:।
अधर्मफलमत्यर्थं तदा भवति चानघ॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
कलियुग में सभी लोग हिंसा में सुख पाएंगे और अपवित्र होंगे। पापरहित! उस समय पाप का फल बहुत अधिक मात्रा में मिलेगा ॥ 51॥
 
In Kaliyug, all people will find happiness in violence and will be impure. Sinless! At that time, the fruits of sin will be reaped in great quantity. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)