श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.188.45 
लोभमोहपरीताश्च मिथ्याधर्मध्वजावृता:।
भिक्षार्थं पृथिवीपाल चञ्चूर्यन्ते द्विजैर्दिश:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! वे ब्राह्मण लोभ और मोह में फँसकर मिथ्या धर्म का ढोंग रचेंगे और चारों ओर से लोगों को भिक्षा के लिए परेशान करेंगे॥ 45॥
 
O King! Those Brahmins, ensnared by greed and temptation, will be pretending to be falsely religious. Moreover, they will also harass people from all directions for alms. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)