श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 41-42
 
 
श्लोक  3.188.41-42 
रसाश्च मनुजव्याघ्र न तथा स्वादुयोगिन:।
बहुप्रजा ह्रस्वदेहा: शीलाचारविवर्जिता:।
मुखे भगा: स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये॥ ४१॥
अट्टशूला जनपदा: शिवशूलाश्चतुष्पथा:।
केशशूला: स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
हे व्याघ्र! उसी प्रकार स्वादिष्ट भोजन भी उतना स्वादिष्ट नहीं होगा जितना होना चाहिए। हे राजन! उस समय की स्त्रियाँ नाटे कद की होंगी और बहुत से बच्चों को जन्म देंगी। उनमें शील और सदाचार का अभाव होगा। युग के अंत में स्त्रियाँ केवल व्यभिचार अर्थात् विषय-वस्तु की ही बातें करेंगी। हे राजन! युग के अंत में प्रत्येक देश के लोग अन्न बेचने वाले होंगे। ब्राह्मण वेद बेचने वाले होंगे और (अधिकांशतः) स्त्रियाँ वेश्यावृत्ति अपनाएँगी*॥41-42॥
 
O tiger! Similarly, the tasty foods will also not be as tasty as they should be. O king! The women of that time will be short in stature and will give birth to many children. They will lack modesty and good conduct. In the end of the age, women will only talk about adultery, i.e., sexual matters. O king! In the end of the age, people of every country will be sellers of food grains. Brahmins will be sellers of Vedas and (mostly) women will adopt prostitution*॥ 41-42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)