श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.188.37 
क्षत्रियाश्चापि वैश्याश्च विकर्मस्था नराधिप।
अल्पायुष: स्वल्पबला: स्वल्पवीर्यपराक्रमा:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! क्षत्रिय और वैश्य भी अपना धर्म त्यागकर अन्य जातियों के कर्म करने लगेंगे। सबकी आयु क्षीण हो जाएगी, सबका बल, साहस और पराक्रम क्षीण हो जाएगा। ॥37॥
 
O Lord of men! Even the Kshatriyas and Vaishyas will give up their religion and start performing the duties of other castes. Everyone's lifespan will be reduced, everyone's strength, courage and valour will decrease. ॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)