श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 32-33
 
 
श्लोक  3.188.32-33 
निवृत्तयज्ञस्वाध्याया दण्डाजिनविवर्जिता:॥ ३२॥
ब्राह्मणा: सर्वभक्षाश्च भविष्यन्ति कलौ युगे।
अजपा ब्राह्मणास्तात शूद्रा जपपरायणा:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
कलियुग के अंतिम भाग (सहस्र चतुर्युग के अंतिम भाग) में ब्राह्मण यज्ञ करना, वेदों का अध्ययन करना, जनेऊ धारण करना और मृगचर्म धारण करना छोड़कर सर्वभक्षी हो जाएँगे (खाने योग्य और न खाने योग्य का विचार त्याग देंगे)। हे प्रिये! ब्राह्मण जप-तप से दूर भागेंगे और शूद्र वैदिक मन्त्रों के जप में लग जाएँगे।
 
In the last part of Kaliyug (the last of Sahasra Chaturyug), the Brahmins will give up performing sacrifices, studying the Vedas, wearing the sacred thread and wearing deerskin and will become omnivorous (abandoning the idea of ​​what is edible and what is not). O dear! The Brahmins will run away from chanting and the Shudras will engage themselves in chanting Vedic mantras.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)