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mahabharat 3.188.29-31h: भरतश्रेष्ठ! जब सहस्रयुग के अन्त में थोड़ा ही समय शेष रह जाता है, कलियुग के अन्तिम भाग में प्रायः सभी मनुष्य मिथ्या हो जाते हैं। पार्थ! उस समय यज्ञ, दान और व्रत-उपवास ये प्रतिनिधि कर्म होने लगते हैं, अर्थात् यज्ञ, दान और तप मुख्य विधि न रहकर नाममात्र के होने लगते हैं। 29-30 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 29-31h
 
 
श्लोक  3.188.29-31h 
अल्पावशिष्टे तु तदा युगान्ते भरतर्षभ॥ २९॥
सहस्रान्ते नरा: सर्वे प्रायशोऽनृतवादिन:।
यज्ञप्रतिनिधि: पार्थ दानप्रतिनिधिस्तथा॥ ३०॥
व्रतप्रतिनिधिश्चैव तस्मिन् काले प्रवर्तते।
 
 
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ! जब सहस्रयुग के अन्त में थोड़ा ही समय शेष रह जाता है, कलियुग के अन्तिम भाग में प्रायः सभी मनुष्य मिथ्या हो जाते हैं। पार्थ! उस समय यज्ञ, दान और व्रत-उपवास ये प्रतिनिधि कर्म होने लगते हैं, अर्थात् यज्ञ, दान और तप मुख्य विधि न रहकर नाममात्र के होने लगते हैं। 29-30 1/2॥
 
Bharatshrestha! When only a little time is left for the end of Sahasra Yuga, in the last part of Kaliyuga, almost all human beings become false. Parth! At that time, the representative actions of Yagya, charity and fasting start happening, that is, Yagya, charity and penance start becoming nominal rather than the main method. 29-30 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)