श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 28-29h
 
 
श्लोक  3.188.28-29h 
एतत् सहस्रपर्यन्तमहो ब्राह्ममुदाहृतम्।
विश्वं हि ब्रह्मभवने सर्वत: परिवर्त्तते॥ २८॥
लोकानां मनुजव्याघ्र प्रलयं तं विदुर्बुधा:।
 
 
अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ! एक हजार चतुर्युग बीत जाने पर ब्रह्माजी का एक दिन होता है। यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्मा के एक दिन तक ही रहता है (और उस दिन के समाप्त होते ही नष्ट हो जाता है)। विद्वान पुरुष इसे लोकों का नाश मानते हैं।
 
O best of men! After the passing of one thousand Chaturyuga, there is one day of Brahmaji. This entire world lasts only for one day of Brahma (and gets destroyed as soon as that day ends). Learned men consider this to be the destruction of the worlds. 28 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)