श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 21-22h
 
 
श्लोक  3.188.21-22h 
यद्येष पुरुषो वेद वेदा अपि न तं विदु:।
सर्वमाश्चर्यमेवैतन्निवृत्तं राजसत्तम॥ २१॥
आदितो मनुजव्याघ्र कृत्स्नस्य जगत: क्षये।
 
 
अनुवाद
वह अन्तर्यामी होकर सबको जानता है, परन्तु वेदों को भी नहीं जानता । नृपशिरोमणे! नरश्रेष्ठ! सम्पूर्ण जगत् के नाश हो जाने पर यह सम्पूर्ण अद्भुत जगत् इसी आदि परमेश्वर से पुनर्जन्म पाता है । 21 1/2॥
 
Being an inner soul, he knows everyone, but he does not even know the Vedas. Nripashiromane! Narashrestha! After the destruction of the entire world, this entire wonderful world is reborn from this original God. 21 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)