श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.188.20 
अनादिनिधनं भूतं विश्वमव्ययमक्षयम्।
एष कर्ता न क्रियते कारणं चापि पौरुषे॥ २०॥
 
 
अनुवाद
उनका न आदि है, न अंत। वे समस्त भूतों के स्वरूप, अविनाशी और नित्य हैं। वे सबके रचयिता हैं, उनका कोई रचयिता नहीं। वे पुरुषार्थ की प्राप्ति का भी कारण हैं॥ 20॥
 
They have no beginning or end. They are the form of all beings, indestructible and everlasting. They are the creator of all; they have no creator. They are the reason for achieving Purusharth (purushaarth) also.॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)