श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 143
 
 
श्लोक  3.188.143 
महद्धॺेतदचिन्त्यं च यदहं दृष्टवान् प्रभो।
इत्युक्त: स मया श्रीमान् देवदेवो महाद्युति:।
सान्त्वयन् मामिदं वाक्यमुवाच वदतां वर:॥ १४३॥
 
 
अनुवाद
"प्रभु! मैंने जो कुछ देखा है, वह अथाह और अकल्पनीय है।" मेरे ऐसा पूछने पर, वक्ताओं में श्रेष्ठ, महान् एवं यशस्वी श्रीभगवान् ने मुझे सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा ॥143॥
 
"Prabhu! What I have seen is unfathomable and unimaginable." When I asked this, the great and illustrious Lord Sri Bhagwan, the best of speakers, consoled me and spoke thus. ॥ 143॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १८८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें एक सौ अट्ठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८८॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १४४ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)