श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 142
 
 
श्लोक  3.188.142 
एतदिच्छामि देवेश श्रोतुं ब्राह्मणकाम्यया।
त्वत्त: कमलपत्राक्ष विस्तरेण यथातथम्॥ १४२॥
 
 
अनुवाद
हे देवेश्वर! कमलनयन! ब्राह्मण की स्वाभाविक जिज्ञासा से प्रेरित होकर मैं विधिपूर्वक आपसे ये सब बातें विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ।
 
Lord Deveshwar! Kamalnayan! Inspired by the natural curiosity that a Brahmin has, I wish to hear all these things from you in detail as prescribed by the law. 142.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)