श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 138
 
 
श्लोक  3.188.138 
त्वत्प्रसादाच्च मे देव स्मृतिर्न परिहीयते।
द्रुतमन्त:शरीरे ते सततं परिवर्तिन:॥ १३८॥
 
 
अनुवाद
प्रभु ! आपकी कृपा से यद्यपि मैं आपके शरीर में तीव्र गति से विचरण करता रहता हूँ, फिर भी मेरी स्मृति नष्ट नहीं हुई है॥138॥
 
Prabhu! By your grace, even though I keep moving at a fast speed within your body, my memory has not been lost.॥ 138॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)