vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना
»
श्लोक 135
श्लोक
3.188.135
तमहं प्राञ्जलिर्भूत्वा नमस्कृत्येदमब्रुवम्।
ज्ञातुमिच्छामि देव त्वां मायां चैतां तवोत्तमाम्॥ १३५॥
अनुवाद
तब मैंने हाथ जोड़कर उनसे कहा, 'हे प्रभु! मैं आपको तथा आपकी इस अद्भुत माया को जानना चाहता हूँ।' 135.
Then I folded my hands and said to him, 'O Lord! I want to know you and this wonderful illusion of yours.' 135.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×