श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  3.188.135 
तमहं प्राञ्जलिर्भूत्वा नमस्कृत्येदमब्रुवम्।
ज्ञातुमिच्छामि देव त्वां मायां चैतां तवोत्तमाम्॥ १३५॥
 
 
अनुवाद
तब मैंने हाथ जोड़कर उनसे कहा, 'हे प्रभु! मैं आपको तथा आपकी इस अद्भुत माया को जानना चाहता हूँ।' 135.
 
Then I folded my hands and said to him, 'O Lord! I want to know you and this wonderful illusion of yours.' 135.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)