श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 132-133h
 
 
श्लोक  3.188.132-133h 
तस्य ताम्रतलौ तात चरणौ सुप्रतिष्ठितौ।
सुजातौ मृदुरक्ताभिरङ्गुलीभिर्विराजितौ॥ १३२॥
प्रयत्नेन मया मूर्ध्ना गृहीत्वा ह्यभिवन्दितौ।
 
 
अनुवाद
हे पिता! तत्पश्चात् मैंने उस बालक के सुन्दर एवं पूजनीय चरण पकड़ लिए, जिनके कोमल एवं लाल रंग के पैर के अंगूठे लाल तलवों से सुशोभित थे और उन्हें सिर से प्रणाम किया॥132 1/2॥
 
O father! Thereafter I took hold of the beautiful and well-respected feet of that child whose soft and red-coloured toes were adorned with red soles and bowed down to them with my head. ॥ 132 1/2 ॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)