श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 131
 
 
श्लोक  3.188.131 
मुहूर्तादथ मे दृष्टि: प्रादुर्भूता पुनर्नवा।
यया निर्मुक्तमात्मानमपश्यं लब्धचेतसम्॥ १३१॥
 
 
अनुवाद
फिर दो ही क्षणों में मुझे एक नया दर्शन हुआ जिसके द्वारा मैं स्वयं को भ्रम से मुक्त और चेतन अनुभव करने लगा।131.
 
Then in just two moments I had a new vision through which I began to feel myself free from illusion and conscious. 131.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)