श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 126
 
 
श्लोक  3.188.126 
ततोऽहं सहसा राजन् वायुवेगेन नि:सृत:।
महात्मनो मुखात् तस्य विवृतात् पुरुषोत्तम॥ १२६॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषरत्न युधिष्ठिर! उनकी शरण लेते ही मैं वायु के वेग से पूर्वोक्त महापुरुष के खुले हुए मुख से सहसा बाहर आ गया॥126॥
 
O gem of men, Yudhishthira! As soon as I took refuge in him, I suddenly came out from the open mouth of the aforesaid great boy with the speed of the wind.॥ 126॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)