श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 123
 
 
श्लोक  3.188.123 
अन्त:शरीरे तस्याहं वर्षाणामधिकं शतम्।
न च पश्यामि तस्याहं देहस्यान्तं कदाचन॥ १२३॥
 
 
अनुवाद
मैं उस बालक के शरीर में सौ वर्षों से भी अधिक समय तक विचरण करता रहा, फिर भी मैंने उसके शरीर का अन्त नहीं देखा ॥123॥
 
I roamed around within that child's body for over a hundred years, yet I never saw the end of his body. ॥ 123॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)