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mahabharat 3.188.117: हे पृथ्वी के स्वामी! उस समय मैं उस बालक के पेट में विचरण करता हुआ पृथ्वी के समस्त प्राणियों को देखता रहा। 117.   |   mahabharat अध्याय 3.188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  3.188.117 
पृथिव्यां यानि चान्यानि सत्त्वानि जगतीपते।
तानि सर्वाण्यहं तत्र पश्यन् पर्यचरं तदा॥ ११७॥
 
 
अनुवाद
हे पृथ्वी के स्वामी! उस समय मैं उस बालक के पेट में विचरण करता हुआ पृथ्वी के समस्त प्राणियों को देखता रहा। 117.
 
O lord of the earth! At that time I kept roaming inside that child's stomach, looking at all the creatures on the earth. 117.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)