श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 111-116
 
 
श्लोक  3.188.111-116 
शुश्रूषायां च निरता द्विजानां वृषलास्तदा।
तत: परिपतन् राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मन:॥ १११॥
हिमवन्तं च पश्यामि हेमकूटं च पर्वतम्।
निषधं चापि पश्यामि श्वेतं च रजतान्वितम्॥ ११२॥
पश्यामि च महीपाल पर्वतं गन्धमादनम्।
मन्दरं मनुजव्याघ्र नीलं चापि महागिरिम्॥ ११३॥
पश्यामि च महाराज मेरुं कनकपर्वतम्।
महेन्द्रं चैव पश्यामि विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम्॥ ११४॥
मलयं चापि पश्यामि पारियात्रं च पर्वतम्।
एते चान्ये च बहवो यावन्त: पृथिवीधरा:॥ ११५॥
तस्योदरे मया दृष्टा: सर्वे रत्नविभूषिता:।
सिंहान् व्याघ्रान् वराहांश्च पश्यामि मनुजाधिप॥ ११६॥
 
 
अनुवाद
शूद्र तीनों द्विजातियों की सेवा और पालन में लगे रहते थे। राजन! यह सब देखकर जब मैं उस महाप्रतापी बालक के पेट में भ्रमण करता हुआ आगे बढ़ा, तो मैंने हिमवान, हेमकूट, निषध, चाँदी के समान चमकने वाले श्वेतगिरि, गन्धमादन, मंदराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय मेरु पर्वत, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय और पारियात्र पर्वत देखे। ये और भी बहुत से पर्वत मैंने उस बालक के पेट में देखे। वे सब-के-सब नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित थे। राजन! वहाँ भ्रमण करते हुए मैंने सिंह, व्याघ्र और सूअर आदि पशु भी देखे। 111—116॥
 
Shudras were engaged in the service and maintenance of all three dual castes. Rajan! Seeing all this, when I moved ahead while traveling in the stomach of that great child, I saw Himavan, Hemkut, Nishadha, silvered Shwetagiri, Gandhamadan, Mandarachal, Mahagiri Neel, golden mountain Meru, Mahendra, Uttam Vindhyagiri, Malay and Pariyatra mountains. I saw these and many more mountains in the stomach of that child. All of them were adorned with different types of gems. Rajan! While roaming there, I also saw animals like lion, tiger and boar etc. 111—116॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)