श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  3.188.110 
क्षत्रियाश्च प्रवर्तन्ते सर्ववर्णानुरंजनै:।
वैश्या: कृषिं यथान्यायं कारयन्ति नराधिप॥ ११०॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! क्षत्रिय राजा सब जातियों की प्रजा का पालन-पोषण करते थे और सबको सुखी एवं संतुष्ट रखते थे। वैश्य लोग खेती और व्यापार का कार्य न्यायपूर्वक करते थे॥110॥
 
O Lord of men! Kshatriya kings entertained subjects of all castes and kept everyone happy and content. Vaishyas carried out farming and trade fairly.॥ 110॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)