श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  3.188.107 
तत: समुद्रं पश्यामि यादोगणनिषेवितम्।
रत्नाकरममित्रघ्न पयसो निधिमुत्तमम्॥ १०७॥
 
 
अनुवाद
शत्रुसूदन! इसके बाद मैंने जलचर जन्तुओं से परिपूर्ण अगाध जल का भण्डार, उत्तम रत्नाकर महासागर भी देखा।
 
Shatrusudan! After this I also saw the most excellent Ratnakar Ocean, a storehouse of deep water filled with aquatic animals.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)