श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.188.1 
वैशम्पायन उवाच
तत: स पुनरेवाथ मार्कण्डेयं यशस्विनम्।
पप्रच्छ विनयोपेतो धर्मराजो युधिष्ठिर:॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! तदनन्तर नम्र धर्मराज युधिष्ठिर ने पुनः प्रसिद्ध मार्कण्डेय मुनि से इस प्रकार पूछा-॥ 1॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter, the humble Dharmaraja Yudhishthir again asked the famous Markandeya Muni in this manner – ॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)