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mahabharat 3.187.55-56: ऐसा कहकर भगवान मत्स्य क्षण भर में अन्तर्धान हो गए। तत्पश्चात् वैवस्वत मनु के मन में भी प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा हुई, किन्तु प्रजा उत्पन्न करते समय उनका मन विरक्त हो गया। तब उन्होंने घोर तप किया और घोर तप से परिपूर्ण होकर उन्होंने सृष्टि का कार्य आरम्भ किया। 55-56॥   |   mahabharat अध्याय 3.187: वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 187: वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा  »  श्लोक 55-56
 
 
श्लोक  3.187.55-56 
इत्युक्त्वा वचनं मत्स्य: क्षणेनादर्शनं गत:।
स्रष्टुकाम: प्रजाश्चापि मनुर्वैवस्वत: स्वयम्॥ ५५॥
प्रमूढोऽभूत् प्रजासर्गे तपस्तेपे महत् तत:।
तपसा महता युक्त: सोऽथ स्रष्टुं प्रचक्रमे॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर भगवान मत्स्य क्षण भर में अन्तर्धान हो गए। तत्पश्चात् वैवस्वत मनु के मन में भी प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा हुई, किन्तु प्रजा उत्पन्न करते समय उनका मन विरक्त हो गया। तब उन्होंने घोर तप किया और घोर तप से परिपूर्ण होकर उन्होंने सृष्टि का कार्य आरम्भ किया। 55-56॥
 
Saying this, Lord Matsya disappeared in a moment. After that, Vaivaswat Manu himself had a desire to create people, but his mind got disillusioned while creating people. Then he performed great penance and after being filled with great penance, he started the work of creation. 55-56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)