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mahabharat 3.187.36-37: हे शत्रुओं का नाश करने वाले! दोनों एक-दूसरे से विदा लेकर अपनी इच्छानुसार चले गए। महाराज! तत्पश्चात मनु ने भगवान मत्स्य की आज्ञा से समस्त बीजों को लेकर एक सुन्दर नौका में सवार होकर प्रचण्ड तरंगों से भरे हुए समुद्र में तैरना आरम्भ किया। 36-37।   |   mahabharat अध्याय 3.187: वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.187.36-37 
जग्मतुश्च यथाकाममनुज्ञाप्य परस्परम्।
ततो मनुर्महाराज यथोक्तं मत्स्यकेन ह॥ ३६॥
बीजान्यादाय सर्वाणि सागरं पुप्लुवे तदा।
नौकया शुभया वीर महोर्मिणमरिंदम॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुओं का नाश करने वाले! दोनों एक-दूसरे से विदा लेकर अपनी इच्छानुसार चले गए। महाराज! तत्पश्चात मनु ने भगवान मत्स्य की आज्ञा से समस्त बीजों को लेकर एक सुन्दर नौका में सवार होकर प्रचण्ड तरंगों से भरे हुए समुद्र में तैरना आरम्भ किया। 36-37।
 
O destroyer of enemies! Both of them took leave from each other and went away as per their wish. Maharaj! Thereafter Manu, as per the instructions of Lord Matsya, took all the seeds and started swimming in the ocean filled with turbulent waves in a beautiful boat. 36-37.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)