श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 187: वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.187.17 
द्वियोजनायता वापी विस्तृता चापि योजनम्।
तस्यां नासौ समभवन्मत्स्यो राजीवलोचन॥ १७॥
 
 
अनुवाद
कमलनयन! उस जलाशय की लम्बाई दो योजन और चौड़ाई एक योजन थी; परन्तु उसमें भी मछलियों का रहना कठिन हो गया॥17॥
 
Kamalnayan! The length of that reservoir was two yojanas and the width was one yojana; but it became difficult for the fish to live even in it.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)