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mahabharat 3.187.12-13: राजा ! वहाँ उन्होंने बड़े आदर के साथ उसका पालन-पोषण किया और वह दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। मनु ने उस पर पुत्र के समान विशेष स्नेह किया। तत्पश्चात्, बहुत समय बीतने पर वह मछली इतनी बड़ी हो गई कि उसका बर्तन में रहना असम्भव हो गया ॥12-13॥   |   mahabharat अध्याय 3.187: वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 187: वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  3.187.12-13 
स तत्र ववृधे राजन् मत्स्य: परमसत्कृत:।
पुत्रवत् स्वीकरोत् तस्मै मनुर्भावं विशेषत:॥ १२॥
अथ कालेन महता स मत्स्य: सुमहानभूत्।
अलिञ्जरे यथा चैव नासौ समभवत् किल॥ १३॥
 
 
अनुवाद
राजा ! वहाँ उन्होंने बड़े आदर के साथ उसका पालन-पोषण किया और वह दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। मनु ने उस पर पुत्र के समान विशेष स्नेह किया। तत्पश्चात्, बहुत समय बीतने पर वह मछली इतनी बड़ी हो गई कि उसका बर्तन में रहना असम्भव हो गया ॥12-13॥
 
King! There they nurtured it with great respect and it started growing day by day. Manu showed special affection towards it like a son. Thereafter, after a long time, that fish became so big that it became impossible for it to stay in the pot.॥ 12-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)