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mahabharat 3.187.10-11: मछली की यह बात सुनकर वैवस्वत मनु को बड़ी दया आई। उन्होंने स्वयं अपने हाथों से उस मछली को उठाया, जो चन्द्रमा की किरणों के समान श्वेत थी और उसे जल से बाहर निकालकर बर्तन में डाल दिया।   |   mahabharat अध्याय 3.187: वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 187: वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  3.187.10-11 
स मत्स्यवचनं श्रुत्वा कृपयाभिपरिप्लुत:।
मनुर्वैवस्वतोऽगृह्णात् तं मत्स्यं पाणिना स्वयम्॥ १०॥
उदकान्तमुपानीय मत्स्यं वैवस्वतो मनु:।
अलिञ्जरे प्राक्षिपत् तं चन्द्रांशुसदृशप्रभम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
मछली की यह बात सुनकर वैवस्वत मनु को बड़ी दया आई। उन्होंने स्वयं अपने हाथों से उस मछली को उठाया, जो चन्द्रमा की किरणों के समान श्वेत थी और उसे जल से बाहर निकालकर बर्तन में डाल दिया।
 
On hearing this from the fish, Vaivasvat Manu felt very compassionate. He himself picked up the fish with his hands which was as white as the rays of the moon and brought it out of the water and put it in the pot.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)