सरस्वत्युवाच
यो ब्रह्म जानाति यथाप्रदेशं
स्वाध्यायनित्य: शुचिरप्रमत्त:।
स वै पारं देवलोकस्य गन्ता
सहामरै: प्राप्नुयात् प्रीतियोगम्॥ ५॥
अनुवाद
सरस्वती बोलीं - मुने ! जो प्रमाद त्यागकर शुद्ध मन से प्रतिदिन स्वाध्याय करता है और अर्चि आदि मार्गों से प्राप्त होने वाले सगुण ब्रह्म को जानता है, वह देवलोक से उठकर ब्रह्मलोक में जाता है और देवताओं के साथ प्रेम-संबंध स्थापित करता है ॥5॥
Saraswati said – Mune! One who gives up carelessness and does self-study daily with a pure mind and knows the Saguna Brahm which is attainable through the paths like archi etc., he rises from the world of gods and goes to the world of Brahma and establishes a love relationship with the gods. 5॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)