हे मुनि! जिस ब्राह्मण की इन्द्र, अग्नि और पवन आदि मरुत्गणों सहित देवतागण उत्तम यज्ञों द्वारा पूजा करते हैं, वही मेरा परम धाम है।
Sage! The Brahman whom the gods worship along with the Marutganas like Indra, Agni and Pawan by performing the best of sacrifices is my ultimate abode.
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि सरस्वतीतार्क्ष्यसंवादे षडशीत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १८६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें सरस्वती-तार्क्ष्यसंवादविषयक एक सौ छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८६॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)