Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.186.25: विद्वान्! जिन यज्ञों में समिधा-स्रुवा आदि वृक्षों से उत्पन्न वस्तुएँ, सुवर्ण आदि सुवर्णमय वस्तुएँ और वृहि आदि पार्थिव वस्तुएँ प्रयुक्त होती हैं, उनसे मेरा दिव्य स्वरूप और ज्ञानमय स्वरूप पुष्ट होता है, इसे अच्छी तरह समझ लो॥25॥ | mahabharat अध्याय 3.186: तार्क्ष्यमुनि और सरस्वतीका संवाद । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
यच्चापि द्रव्यमुपयुज्यते ह
वानस्पत्यमायसं पार्थिवं वा।
दिव्येन रूपेण च प्रज्ञया च
तेनैव सिद्धिरिति विद्धि विद्वन्॥ २५॥
अनुवाद
विद्वान्! जिन यज्ञों में समिधा-स्रुवा आदि वृक्षों से उत्पन्न वस्तुएँ, सुवर्ण आदि सुवर्णमय वस्तुएँ और वृहि आदि पार्थिव वस्तुएँ प्रयुक्त होती हैं, उनसे मेरा दिव्य स्वरूप और ज्ञानमय स्वरूप पुष्ट होता है, इसे अच्छी तरह समझ लो॥25॥
Scholar! In those yagyas, the things produced from trees like Samidha-Sruva etc., the golden things like gold and the earthly things like Vrihi etc. are used, through them my divine form and my form full of wisdom is confirmed, understand this very well. 25॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥