श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 186: तार्क्ष्यमुनि और सरस्वतीका संवाद  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.186.22 
सरस्वत्युवाच
अग्निहोत्रादहमभ्यागतास्मि
विप्रर्षभाणां संशयच्छेदनाय।
त्वत्संयोगादहमेतमब्रुवं
भावे स्थिता तथ्यमर्थं यथावत्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
सरस्वती बोली - मुनि! मैं सरस्वती (ज्ञानस्वरूपा) हूँ और श्रेष्ठ ब्राह्मणों के अग्निहोत्र से आपके संदेह का निवारण करने के लिए यहाँ आई हूँ। (आप भक्त हैं) मैंने आपका सान्निध्य पाकर ही ये उपर्युक्त सत्य बातें यथार्थ रूप में आपसे कही हैं; क्योंकि मेरी स्थिति अन्तरंग भक्ति के भाव में है॥ 22॥
 
Saraswati said - Muni! I am Saraswati [the form of knowledge] and have come here from the Agnihotra of the best Brahmins to clear your doubts. (You are a devotee) I have told you these above mentioned true things in their true form only after getting your company; because my state is in the feeling of internal devotion.॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)