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श्लोक 3.185.37  |
प्रदाय च धनं प्रीत: पुत्रेभ्य: प्रयतात्मवान्।
तप: समभिसंधाय वनमेवान्वपद्यत॥ ३७॥ |
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| अनुवाद |
| तब उन महामुनि ने अपने मन को वश में करके, प्रसन्नतापूर्वक वह सारा धन अपने पुत्रों में बाँट दिया और मन में तप का शुद्ध संकल्प करके वन को चले गए। 37। |
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| Then that great sage, having controlled his mind, happily distributed all that wealth to his sons and with the pure resolution of penance in his mind, went to the forest. 37. |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणमाहात्म्ये पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १८५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मणमाहात्म्यविषयक
एक सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८५॥ |
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