श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 185: ब्राह्मणकी महिमाके विषयमें अत्रिमुनि तथा राजा पृथुकी प्रशंसा  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.185.16 
अथात्रिरपि राजेन्द्र गौतमं प्रत्यभाषत।
अयमेव विधाता हि यथैवेन्द्र: प्रजापति:।
त्वमेव मुह्यसे मोहान्न प्रज्ञानं तवास्ति ह॥ १६॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! तब अत्रि ने भी गौतम को उत्तर देते हुए कहा- 'मुनि! ये पृथु सृष्टिकर्ता हैं, ये प्रजापति इन्द्र के समान हैं। आप माया से मोहित हो रहे हैं, आपकी बुद्धि अच्छी नहीं है।'॥16॥
 
Rajendra! Then Atri also replied to Gautama and said- 'Muni! This Prithu is the creator, he is like Prajapati Indra. You are getting deluded by illusion; you do not have good intellect.'॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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