श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 184: तपस्वी तथा स्वधर्मपरायण ब्राह्मणोंका माहात्म्य  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.184.10 
ते तमूचुर्महात्मानं न वयं सत्क्रियां मुने।
त्वत्तोऽर्हा: कर्मदोषेण ब्राह्मणो हिंसितो हि न:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
यह देखकर उन्होंने महात्मा से कहा - 'मुनि ! अपने पाप कर्मों के कारण अब हम आपके आदर के योग्य नहीं रहे । हमने एक ब्राह्मण की हत्या की है ।'॥10॥
 
Seeing this, he said to the great soul - 'Muni! Due to our sinful deeds, we are no longer worthy of receiving respect from you. We have killed a Brahmin.'॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)