श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 184: तपस्वी तथा स्वधर्मपरायण ब्राह्मणोंका माहात्म्य  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.184.1 
वैशम्पायन उवाच
मार्कण्डेयं महात्मानमूचु: पाण्डुसुतास्तदा।
माहात्म्यं द्विजमुख्यानां श्रोतुमिच्छाम कथ्यताम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन जी कहते हैं - हे जनमेजय! उस समय पाण्डु पुत्रों ने महात्मा मार्कण्डेय से कहा - 'मुनि! हम श्रेष्ठ ब्राह्मणों की महिमा सुनना चाहते हैं, कृपया हमें उसका वर्णन करें।'
 
Vaishmpayana says - O Janamejaya! At that time the sons of Pandu said to Mahatma Markandeya - 'Sage! We wish to hear the glory of the best Brahmins, please describe it to us.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)