श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  3.183.93 
सर्वे भवन्तस्त्वतिवीर्यसत्त्वा
दिव्यौजस: संहननोपपन्ना:।
लोकादमुष्मादवनिं प्रपन्ना:
स्वधीतविद्या: सुरकार्यहेतो:॥ ९३॥
 
 
अनुवाद
राजा युधिष्ठिर! आप सभी लोग बड़े वीर और धैर्यवान हैं। आप दिव्य शक्ति से परिपूर्ण हैं। आप बलवान शरीर वाले हैं और देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए परलोक से इस पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं। इसीलिए आपने समस्त उत्तम विद्याएँ सीखी हैं॥93॥
 
King Yudhishthira! All of you are very brave and patient. You are full of divine energy. You are blessed with strong bodies and have descended on this earth from the other world to accomplish the work of the gods. This is the reason why you have learnt all the best knowledge.॥93॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)