श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 92
 
 
श्लोक  3.183.92 
ये नैव विद्यां न तपो न दानं
न चापि मूढा: प्रजने यतन्ति।
न चानुगच्छन्ति सुखानि भोगां-
स्तेषामयं नैव परश्च लोक:॥ ९२॥
 
 
अनुवाद
जो मूर्ख न तो ज्ञान के लिए, न तप के लिए, न दान के लिए, न धर्मपूर्वक सन्तान उत्पन्न करने के लिए प्रयत्न करते हैं, उन्हें न तो सुख मिलता है, न भोग। उन्हें न इस लोक में, न परलोक में कोई सुख है॥92॥
 
The fools who neither strive for knowledge, nor for penance, nor for charity, nor do they make efforts for producing children in a righteous manner, they neither get happiness nor enjoyment. There is no happiness for them either in this world or in the next.॥92॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)