श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  3.183.9-10 
पूजयामास धौम्यं च यमाभ्यामभिवादित:।
परिष्वज्य गुडाकेशं द्रौपदीं पर्यसान्त्वयत्॥ ९॥
स दृष्ट्वा फाल्गुनं वीरं चिरस्य प्रियमागतम्।
पर्यष्वजत दाशार्ह: पुन: पुनररिंदम:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
फिर धौम्य मुनीका पूजन किया। तत्पश्चात नकुल और सहदेव ने आकर उनके चरणों में सिर नवाया। इसके पश्चात श्रीकृष्ण ने सोये हुए अर्जुन को गले लगाकर द्रौपदी को भली-भाँति सान्त्वना दी। परमप्रिय वीर अर्जुन को बहुत देर के पश्चात् आते देख शत्रु श्रीकृष्ण ने उन्हें बार-बार गले लगाया। 9-10॥
 
Then worshiped Dhaumya Munika. After that Nakul and Sahadev came and bowed their heads at his feet. After this, Shri Krishna consoled Draupadi well by hugging the sleeping Arjuna. Seeing the most beloved brave Arjuna coming after a long time, the enemy Shri Krishna hugged him again and again. 9-10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)