श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 183: काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन  »  श्लोक 83-84
 
 
श्लोक  3.183.83-84 
जितेन्द्रियत्वाद् वशिन: शुक्लत्वान्मन्दरोगिण:।
अल्पाबाधपरित्रासाद् भवन्ति निरुपद्रवा:॥ ८३॥
च्यवन्तं जायमानं च गर्भस्थं चैव सर्वश:।
स्वमात्मानं परं चैव बुध्यन्ते ज्ञानचक्षुषा॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
इन्द्रियों के वश में रहने से वे मन को वश में रखते हैं और सात्विक अन्तःकरण होने से वे स्वस्थ रहते हैं। दुःख और भय का क्षय होने से वे क्लेशों से मुक्त रहते हैं। बुद्धिमान पुरुष गर्भ से गिरते हुए, जन्म लेते हुए अथवा गर्भ में रहते हुए भी ज्ञान की दृष्टि से अपने और ईश्वर के यथार्थ स्वरूप का अनुभव करते हैं। 83-84॥
 
Due to having the senses, they keep the mind under control and due to having a sattvik conscience, they remain healthy. Due to the reduction of sorrow and terror, they are free from troubles. Wise men, even while falling from the womb, taking birth or while still in the womb, from the point of view of knowledge, experience the true reality of themselves and God. 83-84॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)